जिंदा जलाई जाती हैं भारत में बेटियां,
खूंखार दरिंदो के हाथ लुटती बेटियां।
कहने को रूप देवियों का मानते उसे,
कारोबारियों के दम पर बिकी जाती बेटियां।
अस्मत को लूट तार तार होती बेटियां,
आखों को नोच कर जलाई जाती बेटियां।
बेखौफ घूमते दरिंदे पाप करने पर,
बेमौत मारी जाती हैं नादान बेटियां।

सस्ती है इनकी जान देह एक व्यापार है,
जब चाहे आके लुट ले क्या कोई माल है?
क्यों खौफ ना रहा किसीको अब गुनाह का,
सरकार बेजुबान करके बंद कान है।
खंजर दो इन्हें अपनी आबरू बचाने को,
फरमान कत्ल करने का दो हर जल्लाद को।
रहो साथ खड़े इनके बांधकर यही उम्मीद,
इंसाफ करो खुद दिखादो इस जहान को।
क्यों मानवता इस तरह से छलनी हो गई?
क्यों इसकदर दरिंदगी नस नस में पल रही?
क्यों जागता नहीं जमीर अब आवाम का?
हैवानियत, इंसानियत से सस्ती हो गई।
खामोश रहोगे तो यहीं होता रहेगा,
हर राह चलता इसकी सजा पाते रहेगा।
लुटती रहेगी फिर किसी मासूम की अस्मत,
जो होता आ रहा वही फिर होता रहेगा।
कीर्ति शर्मा (प्रित)






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