तुम्हारी खिड़की के पर्दे
ठीक से टंगे नहीं हैं
कोने से थोड़ा सा उघड़ा है
शायद, तुम दीख जाओ
जरूरी नहीं है
पर्दा खोले रखना
बेपर्द रहना
क्यो कि मैं तुम्हें
आंखों से नहीं
मन से देखता हूं
जरूरी नहीं है
तुम्हारा बाल्कनी में
बार बार आना
लुकछिप कर झांकना
गमले का
एक फूल ही काफी है
उसे तुम बस छू भर देना
मैं महसूस कर लूँगा
तुम्हें
हवा की गंध में

- राम प्रसाद यादव






Comments are closed.