
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का प्रबल भक्त होने के कारण उनका हर भाषण पूरी चेतना के साथ सुनता हूं ये बात और है कि मेरा नाम भक्तों की नहीं, दुष्टों की सूची में दर्ज है ,बावजूद बिहार के चुनाव अभियान के पहले दिन पीएम का भोजपुरी छोंक लगा भाषण सुनकर मुझे दूर के ढोल की तरह पीएम का बोल भी सुहावना लगा .यानि दुनिया केवल दूर के ढोल ही नहीं,दूर के बोल भी सुहावने होते हैं .
मेरा मानना है कि चुनावी भाषणों को दूर से ही सुनना चाहिए.चाहे वे भाषण किसी के भी हूं. वे नादान हैं जो चुनावी भाषण सुनने के लिए लाखों की संख्या में चुनावी सभाओं में जान हथेली पर रखकर जमा होते हैं .भाइयो और बहिनो ! अगर भीड़ का हिस्सा बनने से कोरोना-सरोना हो गया तो कोई भाषणवीर आपकी इमदाद करने आने वाला नहीं नहीं है. केंचुआ और अदालतों को चुनावी रैलियों के लिए दिशा निर्देश देने के बजाय इन पर रोक लगाकर दूर से भाषण करने और सुनने के निर्देश देना चाहिए .
अब देश विश्व गुरु बनने के कगार पर है.गुरु ने भी गुरुदेव जैसी आकृति बना ही ली है ऐसे में दूर से भाषण करना और सुनना भी वक्त की जरूरत है. दूर से भाषण सुनिए और अपनी जान भी बचाइए.अब तो दूर से भाषण करने और सुनने की तमाम व्यवस्थाएं हैं .हाथ घड़ी से लेकर मोबाइल और टीवी तक का इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे चुनावों में काला धन का इस्तेमाल रुकेगा साथ ही भारत को किसी ‘ग्रे’ लिस्ट में भी शामिल नहीं होना पडेगा .
दूर के भाषण में हमारे पीएम ने भोजपुरी में जो कहा उसे हम बुंदेलखंडी बड़ी आसानी से समझ गए,क्योंकि उसमें समझने लायक कुछ था ही नहीं .जनता नासमझ है इसलिए उसे समझने में थोड़ा वक्त लगा लेकिन उसने भी समझ लिया .बिहारी समझ गए कि क्यों कोरोना के बाद लाकडाउन हुआ,क्यों उन्हें बेरोजगार होकर पैदल वापस लौटना पड़ा,क्यों सरकार ने बाद में स्पेशल रेलें चलाई और क्यों अब कोरोना का टीका मुफ्त में देने की बात की जा रही है ?इन सभी क्यों का आपसमें बड़ा गहरा रिश्ता है.कोई इन्हें जोड़ कर देख ले तो सब समझ में आ जाएगा .
पीएम के भाषणों वाले दिन ही हमने भाजपा की नजरों में अखंड पप्पू राहुल बाबा और तेजस्वी के भाषण सुनने का भी मौक़ा मिला.हम बड़े मौक़ा परस्त लोग हैं ,जब मौक़ा मिलता है तो चौका लगा ही लेते हैं .राहुल का हिंदी का और तेजस्वी का बिहारी/मैथली का चुनावी भाषण बाबा के भाषणों के मुकावले कम सुहावना नहीं था,ध्यान रखिये ये दोनों भाषण भी हमने दूर से सुने शायद इसीलिए सुहावने लगे.मुमकिन है कि पास से सुनने पर इन तीनों में से एक भी भाषण सुहावना न लगता .
इस समय चुनावी मौसम के साथ ही हमारे पूरे उत्तर भारत में उत्तरदायी सुहाना मौसम है. सर्दी दबे पांव दस्तक दे रही है. पंजाब की पराली उड़ते-उड़ते जहाँ तक जा सकती है जा रही है लेकिन पंजाब का किसान आंदोलन पंजाब से बाहर नहीं निकल पा रहा है. भाजपा के लिए ये भी सुहावनी खबर है अन्यथा बिहार में किसानों के आंदोलन की वजह से कठिनाई हो सकती थी. बिहार में किसान कम ,मजदूर ज्यादा हैं .अपने घरों से दूर-दूर रहते हैं इसलिए उन्हें भी दूर के ढोल सुहावने लगते हैं .अब देखना ये है कि बिहारी मानस इन दूर के बोलों को सुनकर कितना नाचता है ?
हमारे मध्यप्रदेश में तो चुनावी मौसम ‘आयटम ‘से होकर लुच्चा-लफंगा’ तक आ पहुंचा है. पहले हम समझ रहे थे कि ये चुनाव भाजपा और कांग्रेस के बीच में हो रहे हैं लेकिन बाद में हमें हमारे महाराज ने इशारे में बता दिया कि ये चुनाव कांग्रेस और भाजपा के बीच नहीं महाराज और महाराज के ही बीच में हो रहे हैं.शिवराज तो खामखां मेहनत कर रहे हैं .हम अपने महाराज पर भरोसा करते हैं,इसलिए मान लेते हैं उनकी बात .उनकी बात मानकर ही तो 22 विधायकों ने इस्तीफा देकर विधायकी और कुछ ने मंत्री पद छोड़े थे.कलियुग में ऐसा कम ही होता है .
अब अगले महीने हमारे सूबे के मतदाता ये तय कर देंगे कि महाराज का विद्रोह कितना कारगर रहा या डेढ़ सौ साल पुराने विद्रोह की तरह नाकाम हो गया .वैसे विद्रोह नाकाम होकर भी काम का होता है.विद्रोह से आदमी के अंदर की आग सदैव प्रज्ज्वलित होती है.हमारे सूबे में महाराज पहले विद्रोही नहीं हैं. इससे पहले भी उनके अपने खानदान के विद्रोहियों के अलावा उमाश्री भी विद्रोह कर चुकी हैं हालाँकि उन्होंने बाद में समर्पण कर दिया.और पीछे जाएँ तो कुंवर अर्जुन सिंह भी बाग़ी बने थे ,उन्होंने कांग्रेस [तिवारी] बनाई थी लेकिन बाद में वे भी समर्पण भाव से अपनी पार्टी में लौट आये थे.
हमारे यहां पार्टियों में लौटने के लिए एक दरवाजा या खिड़की हमेशा खुली रहती है. आप बगावत कर अगर दोबारा वापस घर वापसी करना चाहें तो आराम से कर सकते हैं. कांग्रेस के मुकुल वासनिक को शायद इस तथ्य की जानकारी नहीं है इसीलिए वे कह रहे हैं कि -‘उनके रहते महाराज कभी कांग्रेस में वापस नहीं आ सकते ‘..कांग्रेस हो या भाजपा इनमें से कभी भी कोई जा सकता है और वापस आ सकता है .पार्टियों में आवाजाही की व्यवस्था लोकतान्त्रिक व्यवस्था है .दुसरे दलों में भी इस व्यवस्था को अंगीकार किया गया है .
बात दूर के बोलों की और दूर के ढोलों की थी और हम आ गए विद्रोह और वापसी पर.खैर जाने दीजिये.राजनीति में विषयांतर होते देर कितनी लगती है ?अब बिहार में ही देख लीजिये 370 की बात हो रही है. बिहार को 370 से क्या लेना भला ?वहां तो दूसरी धाराएं चलतीं है. बिहार नदियों का प्रदेश है धाराओं के बारे में दूसरं से बेहतर जानता है. इसलिए बिहारियों को अज्ञानी नहीं समझना चाहिए .बिहारी अपनी धारा खुद तय करते हैं .जैसे बिहार में नील की खेती तो हो सकती है,लेकिन कमल की नहीं हो सकती .अब नहीं हो सकती तो नहीं हो सकती.बेकार चालीस साल से हल चला रहे हैं कमल के किसान .
हम एक बार फिर से केंचुआ और अपने देश की सबसे बड़ी अदालत से आग्रह करना चाहते हैं की अब तकनीक के युग में जब की स्नकर्मण कदम-कदम पर है भौतिक उपस्थिति वाली चुनावी रैलियां बंद करा देना चाहिए.अब अकेला दूरदर्शन तो है नहीं.सैकड़ों भौंपू हैं जो हार चुनावी सभा का सजीव प्रसारण ले-देकर करते ही हैं,मोबाइल,और घड़ियां हैं ही .इसके जरिये चुनावी सभाएं होना चाहिए .दूरदर्शन भी निजी चैनलों की तरह सभी दलों के लिए फीस लेकर सजीव प्रसारण करने लगे तो उसका राजस्व भी बढ़ेगा और गरीब राजनितिक दलों का कल्याण भी हो सकेगा .इस सबके पीछे एक ही तर्क है की -”दूर के ढोल सुहावने होते हैं ,दूर के बोलों की तरह ‘
@ राकेश अचल







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