भारत में जब विनिवेश की प्रक्रिया शुरू हुई थी तब यह ब्रह्म वाक्य तय हुआ था कि सरकार मुनाफा कमाने वाली कंपनियों को नहीं बेचेगी। सिर्फ उन्हीं कंपनियों को बेचा जाएगा, जो घाटे में हैं और सरकार के लिए बोझ बन गई हैं। इसमें भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इकाइयों और लोक सेवा से जुड़ी कंपनियों को विनिवेश के दायरे से अलग रखा गया था। वे भले घाटे में हों पर उनको करदाताओं के पैसे से चलाए रखने पर राष्ट्रीय सहमति थी। जैसे एयर इंडिया को चलाए रखने में करदाताओं का 50-60 हजार करोड़ रुपया खर्च हुआ। अब इस सिद्धांत को पूरी तरह से उलट दिया गया है। अब घाटे में चलने वाली कंपनियों को नहीं बेचा जा रहा है क्योंकि आज के जो गिने-चुने खरीददार हैं वे उसे नहीं खरीदेंगे। उनको मुनाफा कमाने वाली कंपनी चाहिए। इसलिए सरकार मुनाफा कमा कर देने वाली कंपनियों को बेच रही है।
मुनाफा कमाने वाली कंपनियों को बेच कर पैसे कमाने की सरकार की मानसिकता बहुत खतरनाक है। यह अंततः देश को वैसी स्थिति में पहुंचा देगी, जहां करोड़ों करोड़ लोगों के हितों को देखने वाला कोई नहीं होगा। देश के गरीब, दलित, आदिवासी, वंचित, महिलाएं, बच्चे सब अरक्षित होंगे और बाजार की ताकतों के हवाले होंगे। देश की विशाल आबादी उन पूंजीपतियों के लिए असहनीय बोझ होगी या बाजार। और तब किसी किस्म की संकट की घड़ी में खुद सरकार भी असहाय होगी। देश के नागरिकों की मदद करने के लिए उसे निजी कंपनियों का मुंह देखना होगा।

कोरोना के संकट में सरकारी कंपनियों और सेवाओं ने कितनी मदद की है, उसे समझना कोई मुश्किल बात नहीं है, बशर्ते कोई समझना चाहे। कोरोना के लाखों मरीजों की जांच और उनका इलाज सरकारी अस्पतालों में ही हुआ, निजी अस्पतालों ने तो इस वायरस की आपदा को अवसर में बना कर लोगों को सिर्फ लूटा। कोरोना की वैक्सीन कहां बन रही है? उसके लिए भी सरकारी कंपनी बीबीआईएल ही काम आई है। लाखों-लाख लोगों को उनके घरों तक पहुंचाने में रेलवे की सेवा ही काम आई, निजी परिवहन सेवाओं से यह काम संभव नहीं होता।
सरकार के सामने जब भी आर्थिक संकट आया तब भी सरकारी कंपनियां ही काम आईं। ओएनजीसी के पैसे से भारत सरकार ने कितनी कंपनियों के नुकसान की भरपाई की और उन्हें बचाया! यह अलग बात है कि अब खुद ओएनजीसी ही संकट में है। बैंकिंग के संकट के समय में आईडीबीआई और यस बैंक को सरकार एलआईसी की मदद से ही बचा सकी। अब उसी एलआईसी की 25 फीसदी हिस्सेदारी बेचने की तैयारी हो रही है।
चाहे एलआईसी हो या भारत पेट्रोलियम निगम लिमिटेड हो या शिपिंग कॉरपोरेशन हो या कंटेनर कॉरपोरेशन हो ये सब सोने का अंडा देने वाली मुर्गियां हैं। पर भारत की शेखचिल्ली सरकार इनका पेट फाड़ कर एक बार में ही सारे अंडे निकाल लेने की सोच में काम कर रही है। उसे इस बात से मतलब नहीं है कि इन कंपनियों के सरकारी हाथ में बने रहने से देश के 138 करोड़ लोगों को कितना फायदा होगा। इन्हें बेच कर सरकार को जो पैसे मिलेंगे उससे थोड़े समय के लिए तो खजाना भरा दिखाई देगा पर उसके बाद क्या? वह खजाना खाली होने में कितना समय लगेगा? उसके बाद क्या होगा? उसके बाद सरकार क्या बेचेगी? इस सरकार ने तो कुछ ऐसा बनाया भी नहीं, जिसे आगे जरूरत पड़ने पर कोई बेच सके! पहले से बनी बनाई देश की संपत्ति को बेच डालना कौन सी समझदारी का काम है?
चाहे सरकारी अस्पताल हों, सरकारी कॉलेज, इंस्टीच्यूट हों, सरकारी कंपनियां हों, सब बरसों, दशकों की मेहनत से बनी हैं। लाखों लोगों ने इन्हें अपने खून-पसीने से सींचा-संवारा है। इन्हें बेच कर बदले में जो हासिल होगा वह इनकी सेवाओं के मुकाबले कुछ नहीं है। इनकी सेवाएं ज्यादा मूल्यवान हैं और देश के करोड़ों लोगों के ज्यादा कम आने वाली हैं। इन्हें बेचने की बजाय बचाने की कोशिश होनी चाहिए। आंख मूंद कर सरकार के हर कदम का समर्थन करने वालों को आंखें खोलनी चाहिए। यह हिंदू-मुस्लिम का मामला नहीं है। यह हर भारतीय के जीवन से जुड़ा मुद्दा है। हिंदू-मुस्लिम के झगड़े तो कभी भी सुलझा लिए जाएंगे पर अगर सरकार ने सब कुछ बेच दिया तो आप हिंदू हों या मुसलमान, पूंजीपतियों के लिए भेड़-बकरी ही होंगे। आप जिनकी भक्ति में डूबे हैं वे तो झोला उठा कर चल देंगे, फिर आपका क्या होगा! इसी हालात के लिए दुष्यंत कुमार ने लिखा था- रहनुमाओं की अदाओं पे फिदा है दुनिया, इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारों!
प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम”
शोध प्रशिक्षक एवं साहित्यकार
लखनऊ, उत्तर प्रदेश






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