
नारी का सफर यूँ आसान न समझना
कभी नारी की जीवन आज़मा कर देखना
भ्रूणव्यस्था से माँ के पेट में संघर्ष करती
अंदर बैठे सहमी रहती की
बाहर आऊं तो जान से हाथ न गंवा बैठूं,
पैदा होने के बाद बेटी होने का अभिशाप मिलता
धरती की बोझ हूँ मुझे सब बतलाते
माँ को ताने उम्रभर दिया जाता
तुझसे लड़का पैदा होता नहीं
कहकर धिक्कार मिलता रहता
घर का हर काम सिर्फ लड़कियो से करवाते
पराया घर जाना है बचपन से सुनाते
लहजे में रहना, मुँह हमेशा बंद रखना
लड़की होने का हर सलीका बताते,
नारी का सफर यूं आसान न समझना
कभी नारी का जीवन आज़मा कर देखना,
बड़ी हो गई,अब वर ढूंढ लेते और विवाह करा देते,
चाहे लड़की की इच्छा कुछ और हो
पर उसका दफ़न करके उसे ढोली पर विदा करते,
शादी के बाद पुरुष नारी को अपना जागीर समझता
जो दिल करें वो सलूखा अपनाता
न माने तो मार पीट करके मनवाता
धर्मपत्नी हो मेरी, हर आज्ञा का पालन करना तेरा धर्म है
यह पक्तियां प्रतिदिन उसको सिखलाता
जब होती गर्भवती तो बेटा पैदा हो
जो मेरा वंश बढ़ाएगा
लड़की हुई तो जान से गंवा बैठेगी
ये बात शिशु के पैदा होते तक समझाता
नहीं होता लड़का तो वही प्रकिया दोहरा होता
एक स्त्री के जिंदगी के चक्र का पहिया चलता
नारी का सफर यूं आसान न समझना
कभी नारी का जीवन आज़मा कर देखना
निशा राठौर
डॉ.भीम राव अम्बेडकर महाविद्यालय
नई दिल्ली






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