
संसद से लेकर सड़क तक अन्नदाता पर राजनीति
देखो जोरो से चल रही आज फिर भी अन्नदाता
गरीबी से बदहाल होकर ईश्वर को पुकार रहा है
जो सभी का पेट भरता देखो वही भूखे सो रहा है
भूख से बेहाल होकर किस तरह कराह रहा है
नियति व सरकार आज दिन कैसे दिखा रहा है
धूप में झुलसते किसान कोप्रकृति भी आजमा रही
लोकतंत्र के रखवालों कब तक करोगे राजनीति
हमारे अन्नदाता ही ना होगे तो क्या खाओगे ?
सफल होगा परिश्रम अन्नदाता आस लगाये बैठा
तैयार होगी फसल अच्छी मन में कयास रहता है!
तप रहा था बदन पसीने की ना फिकर रही हैं रे
देखो धूप में झुलसते किसान तुम्हे एसी वाले गाड़ी
में बैठकर गंदी राजनीति करने से फुरसत नहीं है
किस्मत ने आज अन्नदाता को फिर धोखा दे दिया
खेत सूने अन्न बिना मेहनत पर पानी फेर दिया रे
बेचैन हो कर आँखे उसकी मेघ को हैं ताक रही रेे
धूप में झुलसते किसान यह नहीं खबर उनको रे
स्वप्न सलोने मन में अपने कुछ सजा रखे थे यारो
सुख से रहेंगे अबकी बार ये उम्मीद लगा रखे थे!
हुई न कोई फसल कटाई बखरी उनकी खाली रही
धूप में झुलसते किसान व वें राजनीति कर रहे है
देखो ना कैसी विपत्ति से आज किसान गुजर रहा
अन्नदाता होकर भी खुद अन्न को तरस क्यों रहा ?
बिलख रहा परिवार उसका आत्मा भी बिलख रही
कर्ज लेकर साहूकार से दब गया है बोझ तले रे
अब तो डूबा है इस चिंता में मुसीबत ये कैसे टले
जीने की न आस रही न ही भूख और प्यास रही
अन्ततः वह निराश हो कर मृत्यु को स्वीकार रहा
त्याग कर संसार को आत्महत्या अब कर रहा है
दुख भरी कहानी ये मानवता को धिक्कार रही है
क्यों मौन है संसद कब जागेगी आत्मा इसका ?
बैठी है आज सरकार क्यों इतनी शांत होकर रे ?
उबारते क्यों नहीं उनको इस दुख से मदद देकर?
छलक गयीं आँखे दर्दे धरती पुत्र कवि विक्रम
क्रांतिकारी का आप से गुहार कर रहा है बचा लो
अपने तुम दर्दे धरती पुत्र अन्नदाता को साथियों।
विक्रम चौरसिया






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