चुनावों में मुफ्तखोरी वाली संस्कृति

आज हमें यह देखने को मिल रहा है कि सत्ता में रहने वाले अपने कामों से जनता को प्रभावित नहीं कर पाते लेकिन जैसे ही साथियों चुनाव नजदीक आते हैं ,तो राजनैतिक दल अपने पक्ष में सकारात्मक धारणा बनाने के उद्देश्य से लोकलुभावन घोषणाओं की पैंतेरेबाजी
अपनाते हैं। बिहार विधानसभा के चुनाव को ही ध्यान से देखें लीजिए लगभग सभी राजनीतिक दल और उम्मीदवार अपने -अपने स्तर पर जनता को लुभाने के लिए मुफ्त के समान बांटने की घोषणाएं कर रहे हैं। मैं एक न्यूज़ देख रहा था, जिसमें बिहार चुनाव को लेकर एक नेता जी बोल रहे थे कि अगर मेरी सरकार बनती है तो सबसे पहले मैं जो भी छात्र या छात्रा दसवीं क्लास पास करेगा उसको मैं स्कूटी और बाइक दूंगा। यहां मेरा सवाल उनसे है कि जो बच्चे दसवीं पास करेंगे वह लगभग 14 से 16 वर्षों के उम्र के होते हैं, फिर आप उनका लाइसेंस और उनके पेट्रोल का खर्चा का क्या आपको ख्याल है? साथियों आज जहां जरूरत है शिक्षा और स्वास्थ्य के ढांचे को मजबूत करने की लेकिन हमारे जनप्रतिनिधि लोग झूठी लोकलुभावन घोषणाओं से बाज नहीं आ रहे हैं। वैसे साथियों हम इतिहास उठाकर देखें तो चुनावी घोषणा पत्र में वादे करके मुफ्त समान बांटने या कहे की कर्ज माफी की परंपरा हमारे देश में आजादी के बाद से ही प्रारंभ हो गई थी जो कि वर्तमान राजनीति में अपनी चरम सीमा पर है। पिछले वर्ष में ही रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डॉ. सी .रंगराजन ने आर्थिक विकास की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहे थे कि विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए मुफ्त में सामान बांटना या कर्ज माफ करना देश के आर्थिक विकास में बाधा उत्पन्न कर सकता है ।
हमारा भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, हमारे यहां दोस्तों प्रायः प्रतिवर्ष किसी न किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं। लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में स्वास्थ एवं स्वच्छ निर्वाचन लोकतंत्र की बुनियाद होती है, जैसा कि हम जानते हैं कि हमारे भारत के लिए लोकतंत्र की पहली बड़ी परीक्षा आजादी के 4 वर्षों के बाद संपन्न हुई जिसके अंतर्गत 1951 – 52 में प्रथम आम चुनाव हुए। देखा जाए तो इसी समय से ही गरीबों आदि के लिए विभिन्न तरह के वादे किए जाने लगे थे, लोकतांत्रिक एवं लोक कल्याणकारी व्यवस्था में गरीब जनता को न्यूनतम सुविधा लाभ देना जरूरी भी है लेकिन ना जाने कितने सरकार आयी और गई लेकिन गरीबी वहीं की वहीं है।
आजाद भारत में सर्वप्रथम मुफ्त उपहार संस्कृति को तमिलनाडु की एक क्षेत्रीय पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने शुरू किया था, इस दल ने चुनाव जीतने के लिए साथियों 1996 में बीपीएल कार्ड धारकों को मुफ्त में कलर टेलीविजन देने का वादा किया। इस दल का यह फार्मूला काम कर गया और वह चुनाव भी जीत गई और करुणानिधि मुख्यमंत्री भी बन गए। इससे तमिलनाडु के साथ ही अन्य राजनीतिक दलों को चुनाव जीतने का मानो एक नया मंत्र ही मिल गया हो। इसके बाद से ही साथियों सरकारी पैसे से मुफ्त उपहार लुटाने का चलन इस कदर बढ़ता जा रहा है कि आज इसकी सारी हदें पार कर दी है।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी जुलाई 2013 के अपने आदेश में कहा था कि यह नियम स्पष्ट है कि चुनावी घोषणा पत्र में किए गए वादों को जनप्रतिनिधि कानून की धारा 123 के तहत भ्रष्ट कार्य नहीं कहा जा सकता लेकिन साथियों यह सच्चाई है कि किसी भी तरह का मुफ्त समान बांटने से निश्चित तौर पर लोगों पर प्रभाव पड़ता है और इससे सामान प्रतिद्वंदिता प्रभावित होती है। आप ही सोच कर देखो ऐसे में तो जो जमीनी स्तर पर जुड़े हुए व स्वच्छ एवं ईमानदार प्रत्याशी होंगे उनका तो ऐसे में चुनाव जीत कर आना बहुत मुश्किल हो जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा था कि किसी भी प्रकार के मुफ्त उपहारों का वितरण बहुत हद तक स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचन की जड़े हिला देगी। जहां तक लोकतंत्र का मामला है तो एक तरफ हम खुश हैं कि हमारे लोकतंत्र की जड़ें गहरी हो रही है, लेकिन साथियों इससे भी बड़ा खतरा यह है कि अब वोटर और राजनीतिक दलों के बीच याचक और दाता का संबंध बनता जा रहा है। अब हम देख रहे हैं कि लगभग सभी राजनीतिक दल वोट के बदले लोगों को कुछ न कुछ देने का वायदा करने लगे हैं। ऐसा नहीं है कि चुनावी वादे पहले नहीं हुआ करते थे पहले भी हुआ करते थे लेकिन पहले के वादे में सड़क बनवाने, पुल बनवाने, नहर खुदवाने और कारखाने लगवाने के साथ ही स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सार्वजनिक ढांचे को मजबूत करने की बात की जाती थी लेकिन आज वोटर को तुरंत लाभ देने का वादा किया जाता है कि आपको टीवी, साईकिल, लैपटॉप और बाइक दिया जाएगा अगर मेरी सरकार बन जाने पर आखिर यह कैसी राजनीति है ,यहां सवाल उठता है कि इस समस्या से निपटने के लिए क्या उपाय हम करें? चुनाव के दौरान अपने किए गए वादे पूरे करने के लिए मौजूदा सरकार ने चुनाव के दौरान अपना तरीका यह बताया था कि विदेशों में जमा काला धन लाकर और जनता में बांटकर खुशहाली लाएंगे, अपने कुशल प्रबंधन के हुनर से बेरोजगारी को खत्म करेंगे इसके साथ ही भ्रष्टाचार को मिटाकर बिचौलियों को हटाकर महंगाई खत्म करेंगे और देश की आधी से ज्यादा आबादी यानी कि हमारे अन्नदाता किसानों को उसके उत्पाद की लागत का 50 फ़ीसदी लाभ दिलाएंगे, जिससे उनका संकट दूर हो जाएगा। जब यह सब वादे किए जा रहे थे तब यह बात किसी ने नहीं पूछा कि यह बातें व्यवहारिक है भी या नहीं और यह वादे 5 साल में पूरे हो भी सकते हैं या नहीं? पीछे पलट कर देखें ध्यान से तो साथियों मतदाता को राजनीतिक तौर पर शिक्षित करने की जरूरत तो कभी समझी ही नहीं गई है। हकीकत साथियों यही है कि सभी घोषणाएं जनता के लिए नहीं बल्कि वोट हासिल करने के उद्देश्य से ही होती है, किसी भी राजनीतिक दल को अपना घोषणा पत्र इस तरह से बनाना चाहिए जिससे उसकी मंशा जनता का विकास करना हो, इसके साथ ही घोषणापत्र का राजनीतिक और वित्तीय मूल्यांकन भी किया जाना चाहिए। चुनाव आयोग को भी यह परखना जरूर चाहिए कि घोषणापत्र में किए गए वादों की गंभीरता कितनी है। कोई भी घोषणा पत्र राजनीतिक भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाला नहीं होना चाहिए,घोषणा पत्र में स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि जो वायदे किए जा रहे हैं उन्हें पूरा कैसे किया जाएगा क्या वे राजनीतिक और आर्थिक तौर पर पूरे किए जा सकते हैं?जैसा कि हम जानते हैं कि राजकोषीय उत्तरदायित्व बजट प्रबंधन अधिनियम राजकोषीय घाटे को कम करने का प्रावधान करता है ऐसे में चुनाव आयोग को यह देखना चाहिए कि लोकलुभावन वायदे वाले दल या नेता इस अधिनियम के प्रावधान का उल्लंघन करने वाले तो नहीं है। आप सभी से विनम्र निवेदन है कि तत्कालिक लोकलुभावन के चक्कर में आप ना वोट करे बल्कि अपने और अपने बच्चों के भविष्य को देखते हुए सही प्रत्याशी का ही चुनाव करें।।

विक्रम चौरसिया

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