चश्में के भीतर से/ घनश्याम तिवारी का मशहूर स्तंभ- गाँव गाँव गाँधी बाबा अभियान – लोक सदन और हम!

एक लंबे अंतराल के बाद विद्यालय खोले जाने के कारण हम शिक्षकों के ऊपर काम का इतना दबाव था कि बच्चों के पढा़ई , प्रैक्टिकल्स एवं आॉफलाईन एक्जाम्स कंडक्ट करवाते करवाते कब सुबह से शाम हो जाती थी कि पता ही नहीं चल पाता था । यहाँ तक की साहित्यिक मित्रों से विचार विमर्श , लेखन – मनन सब पर लगभग विराम सा लग गया था । कुछ दिन ऐसे ही बीतें , जब गाडी़ थोडी़ पटरी पर आई तो हमने डरते डरते आदरणीय संपादक महोदय को फोन लगाया .. लेकिन फोन उठ नहीं पाया .. । एक बार संपादक जी से चर्चा भी हुई लेकिन उन्होंने कुछ खास कहा नहीं लेकिन संकट के दौर से गुज़रते छोटे और मँझौले कद के अख़बारों के बारे में थोडी़ चर्चा की और प्रत्यक्ष मिलने पर विस्तार से चर्चा करने की बात कही ।
फोन तो कट चुका था परंतु पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था कि संपादक जी किसी न किसी परेशानी में हैं लेकिन उन्होंने विस्तार से कभी बात होगी कहकर बात टाल दी और कुछ बताया नहीं.. । बहरहाल मैं पास के ही एक गाँव में अगले दिन संपादक जी के द्वारा महात्मा गाँधी जी की प्रतिमा स्थापना वाले कार्यक्रम में जाने की योजना बनाने में लग गया ।
स्कूल से छुट्टी मिलेगी या नहीं .. ऐसा क्या हुआ कि हमेशा ज़िदादिली से बात करने वाले हमारे संपादक श्री रोहरा जी की आवाज़ में एक गुप्त परेशानी महसूस हुई थी । आखिर क्या थी इसके पीछे की वजह … ? मैंने तुरंत अपने मित्र और सहयोगी ईंजीनियर साहब भाई रमाकांत जी को फोन लगाया । संपादक जी के बदले हुए व्यवहार और उसके पीछे की परेशानी पर हमने काफी देर तक चर्चा की लेकिन किसी खास नतीजे़ पर नहीं पहुँच पाए । चर्चा समाप्त होते होते हमने प्लान बनाया और दूसरे दिन दोपहर बाद लगभग तीन बजे के करीब हम आदरणीय संपादक जी के दरवाजे पर खडे़ थे ।
साथी रमाकांत ने आवाज़ लगाई तो अंदर से रोहरा भाभी जी आ गई । उन्होंने हमें पहचान लिया और -“आ ही रहे होंगे” कहते हुए भीतर आमंत्रित कर ठंडे पानी का गिलास टेबल पर रखा । रोहरा भैया तो थे नहीं लेकिन उनका अपने से छोटों और सहयोगियों के प्रति स्नेह आदरणीया भाभी जी के अपनापन भरे व्यवहार से साफ परिलक्षित हो रहा था । कुछ मिनट बीते होंगे कि संपादक जी का फोन आ गया .. भाभी जी से बोलें .. दोनों को बैठा कर रखना .. जलाराम के टेस्टी समोसे लेकर आ रहा हूँ .. साथ बैठकर खाएंगे । हम भी फोन पर रोहरा भाईसाहब और भाभी जी का वार्तालाप सुन रहे थे । मैने प्रश्न भरी नज़रों से रमाकांत को देखा … तो अचानक ही रमाकांत बुदबुदा उठे .. हमन के आए के खुशी म संपादक जी के अवाज कैसे बदल गे हे .. कोई परेशानी अऊ समस्या तो लगबेच नहीं करत हे .. मैं भी कुछ ऐसा ही महसूस कर रहा था लेकिन बस मुस्कुराकर रह गया और संपादक जी के आने के आने का इंतजा़र करने लगा ।
थोडी़ देर में दरवाजे की घंटी बजी और संपादक जी हमारे सामने थे । काॅटन का आॉफ व्हाईट कुर्ता पैजामा , सर पर गमछी बाँधे और माॅस्क से मुँह ढके संपादक जी को देखकर लग रहा था कि वो किसी सामान्य कार्य से तो नहीं ही गये होंगे बाहर .. उनके चेहरे का संतोष और आत्मविश्वास देखकर लग रहा था कि ज़रूर किसी न किसी ज़बरदस्त मिशन पर गये रहे होंगे संपादक जी और विजेता बनकर लौटे हैं ।
ईंजीनियर साहब और मैं .. , हम दोनों ने प्रणाम किया और बैठते हुए उनकी ओर देखने लगे । खाओ .. खाओ .. अरे यह सब आप लोगों के लिए ही लाया हूँ … सामने रखी तश्तरी से एक समोसा उठाते हुए संपादक जी बोले । हमने भी एक एक समोसा उठा लिया .. । चटनी ज़रा अलग से कटोरी में देना .. भाभी जी को आवाज़ लगाते हुए संपादक जी ने हमसे पूछ लिया .. और कैसे हैं आप लोग .. इधर कई दिनों से कुछ खैर खबर ही नहीं .. । संपादक जी के चेहरे पर ज़रा भी शिकन नहीं था हाँ एक हल्की मुस्कान ज़रूर बिखर रही थी ।
मुझसे अपने आपको और रोका नहीं गया और मैं पूछ पडा़ .. आखिर समस्या क्या है ? आप हम लोगों से क्या छुपा रहे हैं ? संपादक जी ने पानी का गिलास उठाया , एक घूँट पीया और बोलने लगे … ऐसा नहीं है कि आप लोग आज की परिस्थिती के बारे में नहीं जानते । इस महामारी ने देश के बडे़ बडे़ और नामी गिरामी अख़बारों और पत्र – पत्रिकाओं को लील लिया तो हमारी बिसात ही क्या ? अब तक तो सब कुछ थोडा़ ऊपर नीचे कर काम चल रहा था लेकिन इस वक्त अत्यंत विषम परिस्थिती है लेकिन चिंता की कोई बात नहीं है .. मैने अख़बार का पूरा भार अपने ऊपर ले लिया है किसी न किसी तरह सब मैनेज हो जाएगा ..। हमारे द्वारा साहित्यिक मित्रों से सहयोग लेने की बात को उन्होंने शिरे से नकार दिया और बोले एक दो या चार या छै महीने की बात नहीं है कब यह दौर खत्म होगा और कब परिस्थितियाँ सामान्य होंगी ? कहा नहीं जा सकता … कितने दिनों तक सहयोग ले लेकर काम चलता रहेगा । इसलिए मैने सारा दारोमदार अपने ऊपर ले रखा है । यदि कोई स्वस्फूर्त सहयोग करना चाहे तो अलग बात है पर मैं किसी से माँगने और कहने नहीं जाउंगा कुछ भी … ।
यह तो सचमुच बडी़ गंभीर बात है लेकिन आपको देखकर लगता नहीं कि आप किसी भी प्रकार की परेशानी से गुज़र रहे हैं । आपकी व्यस्तता और चेहरे पर कुछ विशेष करने का भाव स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है । आप खुलकर बताइये न संपादक जी .. हमारे ऊर्जावान युवा सहयोगी ईंजीनियर साहब ने थोडा़ बल देकर संपादक जी से पूछा । संपादक जी ने कहा – जहाँ तक आर्थिक तंगी की बात है तो यह तो लगा ही रहेगा हमेशा … किसी न किसी तरह ठीक भी हो जाएगा । मैं तो परेशान हूँ कि बापू के सिद्धांतों और विचारों को जन जन तक पहुँचाने हेतु और इसके लिए हर गाँव गाँधी बाबा की प्रतिमा लगाने का अभियान किस तरह आगे बढे़गा .. ?
बातों बातों में पता चला कि संपादक जी की तबियत भी बीच में नासाज हो चली थी । स्थानीय डाक्टरों ने तो न जाने क्या क्या ही कह दिया था .. ? अहमदाबाद में गहन चिकित्सा विमर्श लेने पर पता चला कि सब कुछ ठीक ठाक है … कोई विशेष समस्या नहीं है । शायद यही कारण है कि थोडी़ देर के लिए उनका आत्मविश्वास डगमगा गया था .. शायद वो अपने आपको अकेला महसूस करने लगे थे ।
संपादक जी की बात सुनकर मैने कहा – आप अपने आपको एकदम अकेला न समझें संपादक जी .. पूरा का पूरा लोकसदन साहित्य मंच परिवार और हम सभी आपके साथ हैं और कदम से कदम मिलाकर चलेंगे और आगे बढा़एंगे आपके हर गाँव गाँधी बाबा अभियान को … । बिलकुल सर … हम लोग आपके साथ मुश्तैदी से खडे़ हैं । आप थोडी़ भी चिंता मत करियेगा … हम लोग जहाँ रहेंगे .. जिस भी हाल में रहेंगे आपके साथ कंधा से कंंधा मिलाकर इस अभियान को आगे बढा़एंगे .. ईंजीनियर साहब ने बोलते हुए संपादक जी का हाथ पकड़ लिया ।
संपादक जी के घर से वापसी के समय बार बार मैं पलट कर संपादक जी को ही देख रहा था । गाँधी जी के जीवनशैली में ढ़ली कद काठी और चेहरे पर हमसे मिलने के बाद अभियान को गति मिलने की उम्मीद और एक संतोष स्पष्ट दिखाई दे रहा था । मैं रास्ते भर बस संपादक जी और उनके हर गाँव गाँधी बाबा अभियान के बारे में ही सोचते जा रहा था । घर पहुँचते ही बिना स्टडी टेबल पर रखे अनोखेलाल जी के दर्शन हो गये । झटपट मुँह हाथ धोया और गिलास भर पानी गट गट करने के बाद चढा़ लिया अनोखेलाल जी को अपनी आँखों पर और लगा झाँकने चश्में के भीतर से …. ।
यदि देखा जाय तो आज समूचे विश्व में पूज्य बापू के नाम से शासकीय – गैरशासकीय और सामाजिक अनगिनत संस्थाएँ मिल जायेंगी जो गाँधी जी के सिद्धांतों के वृहद प्रचार – प्रसार करने और गाँधीवादी स्वयंसेवकों को व्यापक प्रोत्साहन आदि देने का दावा करती हैं। गाँधी जी के नाम पर तरह तरह के फंड इकट्ठा करने और पत्र पत्रिकाएँ प्रकाशित कर उनकी राॉयल्टी में ये संस्थाएँ लगी रहती है । गाँधी जी के मूल सिद्धांतों से इनका कुछ लेना देना नहीं । यहाँ तक की आजकल तो तरह तरह के अंदाज में अपने नाम के आगे गाँधी उपनाम जोड़कर उसे भी भुनाने की कोशिसें हो रही है । नगरों – महानगरों में तो लोग कुछ ज्यादा ही गाँधीवादी होने का दिखावा करते हैं और उसकी आड़ में खूब अपना उल्लू सीधा करते हैं । ऐसे में आज की महति आवश्यक्ता यह है कि विश्व के हर एक कोने में हर गाँव में जाकर भोले भाले ग्रामीणजनों को पूज्यगाँधी बाबा के सिद्धांतों और उनकी जीवनशैली से परिचय करवाया जाय और उनके निष्पाप हृदय में गाँधीयन विचारधारा को पुष्पित पल्लवित किया जाय ।
लोकसदन के संपादक और साहित्यकार सुरेशचंद्र रोहरा ने यह बीडा़ उठाया है । बापू के सिद्धांतों का गहराई से अध्ययन कर और उन्हें पूर्णतया आत्मसात कर गाँधी जीवन शैली युक्त जीवन व्यतीत करते रोहरा जी गाँधी जी के विचारों को देश ही नहीं वरण विश्व के कोने कोने में फैलाने हेतु प्रयासरत है । इस पुनीत कार्य हेतु उन्होंने देश के हर गाँव में पूज्य बापू की प्रतिमा स्थापित करने का बीडा़ उठाया है । मैं आप सभी देशवासियों का आह्वान करता हूँ कि आप भी आदरणीय संपादक द्वारा शुरू किये गये इस आह्वान से जुडे़ं और गाँव गाँव तक गाँधियन विचारधारा का प्रचार – प्रसार कर एक सशक्त और आदर्श राष्ट्र निर्माण में सहभागी बनें क्योंकि जब चलेगा गाँव – गाँव गाँधी बाबा अभियान – तभी तो होगा राष्ट्र कल्याण …

घनश्याम तिवारी
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