चश्में के भीतर से /घनश्याम तिवारी-टीआरपी के पीछे भागती मीडिया और हमारा समाज

घर के सभी लोग लीविंग हाॅल में टेलीविजन पर कोई शो देखते हुए हँसी ठहाके लगाने में व्यस्त थे और इधर मैं अपने बिस्तरे पर औंधे लेटा आँख बंद किए हुए संगीत की धुनें सुन रहा था । थोडी़ देर बाद श्रीमती जी की आवाज़ सुनाई पडी़ – बिट्टू तेरे पापा कहाँ हैं रे …. हम सब लोग यहाँ टीवी देख रहे हैं खा पी रहे हैं … मस्ती कर रहे हैं, वो न जाने कहाँ समाधि लगाए बैठे हैं … ?

इससे पहले की मुझे ढूँढ़ने का सर्च अभियान चलाया जाता, मैंने खुद ही अपने को सबके सामने सेरेन्डर कर दिया। और पहुँच गया जहाँ टीवी पर किसी खास शो को देखने मजमा लगा हुआ था।
मैने सामने ही रखी तश्तरी में रखे भुने हुए मकई के दानों को चुभलाते हुए पूछा – यार एक बात बताओ, तुम लोग दिन भर ये सास बहू वाले और हँसी मजाक वाले सीरियल्स देखते रहते हो बोर नहीं होते … ?

कभी कभी न्यूज वगैरह भी देख लिया करो .. देश दुनियाँ का हाल चाल भी जान लिया करो कि इस दुनिया में क्या चल रहा है.. ? मेरा इतना कहना ही था कि समाज में घटित होने वाली घठनाओं पर पैनी नज़र रखने वाली और बेबाक टिप्पणी करने वाली बिटिया रानी फट पडी़ … ।

              आप तो रहने ही दो, पापा   ..... । ये टीवी न्यूज वाले दिखाते ही क्या हैं भला  । सबको खबरें दिखाने से कम और चींखने चिल्लाने और अपना टीआरपी बढा़ने से ज्यादा ही मतलब होता  है। क्या अब पूरी दुनिया में सिर्फ एक सुशांत मर्डर केस और फिल्म इंडस्ट्री में ड्रग्स वाला यही मुद्दा रह गया है कि जब देखो तब यही खबरें दिखाईं जा रही हैं। सब के सब ढोंगी और पाखंडी है। सर्वश्रेष्ठ और पूर्ण रूप से सामाजिक सरोकार रखने का दावा करने वाले ये मीडिया वाले सभी स्वार्थी और संवेदनहीन हो गये हैं और अपना अपना उल्लू सीधा करने में लगे  हुए  हैं। 

                 बिना ब्रेक वाली मोटरसाइकिल की तरह भड़ भड़ भड़ भड़ बोलती चली जा रही थी बिटिया रानी। मुझे तो जैसे साँप सुंघ गया था।  सब के सब खामोश थे। मेरे चेहरे पर लाल पीले भाव आते देख मेरे बेटे यश ने कहा - ठीक ही तो कह रही है दीदी, पापा  ... । आप लोग प्रेस और मीडिया से जुडे़ हो तो भी बुरा मानने की ज़रूरत नहीं है। टीवी वाले चैनल्स तो चैनल्स यहाँ तक की अख़बारों तक का यही हाल हो गया है हर जगह बस एक ही खबर...  अब वह सीबीआई दफ्तर पहुँच चुकी  है...  अब वह खाना खाने वाला है...  अभी अभी खबर मिली कि उसने खाना खाना शुरू नहीं किया अभी तो सिर्फ पानी का गिलास ही उठाया है...  ।मेरा बस चले तो ये सारे चैनल्स ही बंद करवा दूँ । 
            अरे मैं तो यूँ ही बोल रहा था तुम लोगों को जो देखना है देखो  ... मैने घर के माहौल में आई गरमी को भाँपते हुए यह कहकर अपने चश्में महाराज को उठाया और चल पड़ा स्टडी टेबल की तरफ। चश्में की काँच पर जमी धूल को झडा़कर चढा़ लिया अनोखेलाल जी को अपनी नाक पर और लगा झाँकने चश्में के भीतर से  अब सब कुछ साफ साफ और स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था।  वो दौर कुछ अलग ही था जब भारतीय मीडिया जगत समाज में बिना किसी भेदभाव के सभी तरह की और वास्तविक एवं सच्ची खबरें पहुँचाकर नई चेतना और जागरुकता फैलाने का कार्य करता था। आज का आलम यह है कि लगभग हर एक राजनैतिक पार्टियों ने औद्योगिक घरानों के साथ मिलकर अपना  अपना मीडिया हाउस बना लिया है और प्रसार के माध्यमों का दोहन करते हुए स्वयं की स्वार्थ सिद्धि में लग गये हैं। 
       पहले मीडिया क्षेत्र का संपूर्ण संचालन बुद्धिजीवियों , समाजशास्त्रियों और बेबाक और निर्भीक पत्रकारों के हाथ में था। इसलिए उस समय के अख़बारों और चैनल्स की खबरों की धार में ज़बरदस्त पैनापन था। सामाजिक जागरुकता, साहित्य  ,संस्कृति और रचनात्मक खबरों से भरे पडे़ रहते थे अख़बार। आज का समय एक ऐसा समय आ गया है कि समाज की दिशा और दशा देने वाले हमारे अनेकों महान विभूतियों की जन्म जयंती और पुण्यतिथियाँ यूँ ही निकल जातीं हैं और विश्व में सबसे ज्यादा देखे पढ़े और सुने जाने का दंभ भरते हुए खुद की पीठ थपथपाने वाले लोकतंत्र के तथाकथित चौथा स्तंभ कहे जाने वाले हम लगातार आपनी लोकप्रियता बढा़ने दौड़ते भागते रहते हैं। इन बेहद ही ज़रूरी चीजों और अपने मुख्य उद्देश्य की ओर ध्यान तक देना मुनासिब नहीं समझते। 
               भारत जैसे सबसे बडे़ लोकतंत्र के लिए इससे बड़ी लज्जा और हीनता की बात और कोई नहीं हो सकती  । लेकिन कहते हैं न जहां घनघोर अँधेरा होता है वहीं कहीं रौशनी की एक किरण भी छुपी होती  है।  इस अति व्यावसायिक हो चले मीडियाहाउस वाले दौर में आज भी कई छोटे और मझोले कद के ऐसे मीडिया समूह हैं जो आपने सामाजिक सारोकार का निर्वहन अत्यंत संजी़दगी और ईमानदारी से कर रहे हैं ।
       मुझे यह कहने में क़तई संकोच नहीं कि हमारे क्षेत्र में सैकडों की संख्या में प्रकाशित होने वाले अख़बारों की दुनिया में हमारा समाचार पत्र लोकसदन पत्रकारिता और सामाजिक सरोकार के पैमाने पर शत प्रतिशत खरा उतर रहा है। शायद ही कोई अवसर छूटा होगा जब हमने देश की महामानवों की जयंती और अन्य ऐतिहासिक अवसरों पर कुछ विशेष न किया हो। यही कारण है कि लगभग रोज ही एक न एक अपील हमारे संपादक  सुरेशचंद्र रोहरा , साहित्य संपादक नरेश चंद्र नरेश, संयोजक इंजीनियर साहब भाई रमाकांत जी, भाई निशांत जी के माध्यम से आती रहती है और मंच से जुडे़ विश्व के दिग्गज रचनाकारों की रचनाओं से हमारा लोकसदन न सिर्फ सज जाता है। बल्कि पूरी दुनिया को पत्रकारिता का वास्तविक उद्देश्य और स्वरूप समझा जाता है।
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