गांधी विलक्षण व्यक्ति थे।वे अनूठे थे।उनके जन्म के बाद के इतिहास और वर्तमान में उन जैसा व्यक्तित्व विश्व में नहीं पैदा हुआ।अलग-अलग क्षेत्रों में श्रेष्ठ,बुद्धिमान,साहसी व्यक्ति हो सकते हैं।परंतु ऐसा व्यक्तित्व जिसमें सादगी, बुद्धिमानी,त्याग साहस, जनकल्याण, इमानदारी सब हो कही नहीं दिखता है। गांधी को समझना तो बहुत ही दुरूह कार्य है।उनके ऊपर तमाम विद्वान काम कर रहे हैं हजारों शोध हो चुके हैं। परंतु हम जैसे साधारण लोगों के लिए गांधी को पढ़ना व समझने का प्रयास करना, अपने जीवन को सही मार्ग पर ले जाने का एक कदम है। गांधीजी को पढ़ते समय सबसे बड़ी बात जो सामने आती है,वह यह है कि आपके सामने एक ऐसा जीता जागता उदाहरण है जो केवल उपदेश नहीं देता है परंतु जो कहता है उसको जीता है। बहुधा देखा जाता है कि लोग अच्छी बातें करने के उपदेश तो बहुत देते हैं परंतु उसका आचरण नहीं करते हैं। गांधी यहीं पर जीत जाते हैं। वे जो कहते हैं वही करते हैं। उनका कहना था “मेरा जीवन ही मेरा संदेश है” । इस साधारण से दृष्टि से देखा जाए तो गांधीजी की कुछ बातें समझना बहुत आसान भी है।जब आपको यह लगता है की आप एक ऐसे आदमी के बारे में में पढ़ रहे हैं जो अपनी कही बातों का पालन भी करता है। तब आपके सम्मुख एक आदर्श उपस्थित होता है कि अरे यह तो मैं भी कर सकता हूं। गांधी को पढ़ते समय आपके सामने सबसे बड़ा चैलेंज रहता है कि इस दृष्टि में मैं कहां खड़ा हूं। मैं इन बातों का कितना अनुपालन कर पा रहा हूं। मैं किसके साथ खड़ा हूं।आपको अपनी कसौटी देखनी पड़ती है कि आप सताने वाले के साथ में हैं या जो शोषित है उसके पक्ष में खड़े हैं। यह बातें आपको एक अगले स्तर पर ले जाती है। गांधी कहते थे कि मैं कोई नई बात नहीं कह रहा हूं ना कोई संदेश देना चाहता हूं। मैं केवल यह कहता हूं कि जो कहो वह करो।
आजादी के बाद जब बहुत सारे नेता व्यक्तिगत जीवन के अनुपालन में गांधी जी का दर्शन से दूर होते गए तब हम देखते हैं कि गुदड़ी के लाल कहलाने वाले भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व श्री लाल बहादुर शास्त्री अपने निजी जीवन में गांधीवाद के सच्चे प्रतिनिधि थे। उन्होंने कभी भी सत्ता सुख को अपने निजी जीवन में नहीं भोगा। वे गांधी जी की जीवन पद्धति के तीन महत्वपूर्ण बिंदुओं के सच्चे अनुपालक थे। यह बिंदु थे स्वैच्छिक गरीबी,स्वैच्छिक सादगी, स्वैच्छिक धीमी गति। आज हम लोग इन बातों से कोसों दूर है। इसीलिए या तो गांधी की बुराई कर के किनारे कर लेना चाहते हैं या फिर उन पर केवल माल्यार्पण करना चाहते हैं। परंतु यह तय है की न केवल अपना देश वरन पूरा विश्व उस विरासत को नहीं भूलने वाला है। तभी आज विश्व में अहिंसा दिवस मनाया जाता है। यह सार्वभौम सत्य है कि हर युद्ध का अंत शांति ही है। यह संकल्प लेने का दिन है कि हम इन आदर्शों में से जो भी संभव होगा वह अवश्य पालन करेंगे और कहीं ना कहीं गांधी जी की बातों का अपने जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे। यही गांधी जी और शास्त्रीजी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
गांधी जी कहते हैं” जो मत मैने कायम किए हैं और जिन निर्णयों पर मैं पहुंचा हूं, वे भी अंतिम नहीं है। हो सकता है, मैं कल ही उन्हें बदल दूं। मुझे दुनिया को कोई नई चीज नहीं सिखानी है। सत्य और अहिंसा अनादि काल से चले आये हैं। मैंने तो यथाशक्ति विशाल से विशाल पैमाने पर इन दोनों के अपने जीवन में प्रयोग भर किए हैं। ऐसा करते हुए कभी-कभी मैंने गलतियां भी की है और अपनी उन गलतियों से सीखा भी है।इस प्रकार जीवन और उसकी समस्याओं ने मेरे लिए सत्य और अहिंसा के पालन में अनेक प्रयोगों का रूप ले लिया है। “

राकेश श्रीवास्तव
लखनऊ






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