बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार बेरोजगारी जैसी गंभीर जमीनी समस्या सचमुच मुख्य चुनावी मुद्दा बना हुआ है।जातिवाद के महासागर में यह उफान संभव होना कोई छोटी सी बात नहीं है ,लेकिन धरातल पर कितना उतरता है यह तो वक्त बताएगा।लेकिन साथियों पिछले माह ही हमने सुना कि राज्य में 15 साल से मुख्यमंत्री की कमान थामे जदयू नेता नीतीश कुमार ने एक नया पासा यह फेंका कि यदि किसी दलित का मर्डर हुआ तो वो पीडि़त परिवार के एक सदस्य को नौकरी देगे ,आज दोस्त हमें सोचने के लिए यह मजबूर कर रहा है कि नौकरी देने के लिए मर्डर की हसरत बड़ा ही अजीब और विडंबना भी है। इसी नीतीश कुमार के दांव को भापकर हमने देखा कि मुख्य विपक्षी पार्टी राजद ने प्रदेश के बेरोजगारों को लुभाने के लिए बेरोजगारी हटाओ नाम से पोर्टल लांच किया।कहीं यह सब केवल चुनावी घोषणाएं तो नहीं ना है।
वैसे दोस्त देश में बेरोजगारी की हालत कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा उन सरकारी आंकड़ों से लगाया जा सकता है, जिनके मुताबिक देश में मनरेगा के तहत इसी साल अप्रैल से लेकर अगस्त तक पांच महीनों में 83 लाख से अधिक नए जाॅब कार्ड बने हैं, जो बीते सात सालों में सर्वाधिक हैं। जबकि वर्ष 2019-20 में कुल 64.70 लाख मनरेगा कार्ड ही जारी किए गए थे। जाहिर है कि कोरोना और लाॅकडाउन ने सबसे ज्यादा गरीबों का काम छीना है।
अकेले बिहार की ही बात करें तो लाॅकडाउन के दौरान 40 लाख प्रवासी बिहारी मजदूरों को काम गंवाकर घर लौटना पड़ा था। इनमें से बहुत कम फिर अपने काम पर लौट सके हैं। जो नए मनरेगा कार्ड बने हैं, उनमें भी बिहार दूसरे नंबर पर है। वहां पांच माह में 11.22 लाख नए जाॅब कार्ड बने हैं। अर्थात राज्य में इतने बेरोजगार और बढ़ गए हैं।
इस परिस्थिति को भी राजनीतिक दल ‘आपदा में अवसर’ के चश्मे से देख रहे हैं। लिहाजा इस बेरोजगार वोट बैंक को लुभाने की होड़ शुरू हो गई है। ध्यान रहे कि पूरे देश में इस साल 3 सितंबर तक कुल 14.36 करोड़ मनरेगा कार्ड बने हैं। यानी इतने लोगों को काम चाहिए।
बिहार कितना बदला या बदल रहा है, इसके बरक्स यह कड़वी सचाई है कि देश का बेरोजगारी ग्राफ बहुत तेजी से बदल रहा है। सीएमआईई की 4 सितंबर 2020 की रिपोर्ट देखें तो देश में बेरोजगारी की दर बढ़कर 8.3 प्रतिशत हो गई है। जिसमें शहरी बेरोजगारी दर 9.7 तथा ग्रामीण बेरोजगारी दर 7.9 प्रतिशत है।
अहम बात यह है कि गले-गले तक जातिवाद में डूबे बिहार जैसे राज्य में बेरोजगारी को कोर चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है। यह कितनी कामयाब होगी, यह देखने की बात है। भारतीय राजनीति की विडंबना यह है कि यूं तो हर चुनाव में बेरोजगारी और महंगाई जैसे जमीनी मुद्दे उछाले जाते हैं, लेकिन दूसरे भावनात्मक मुद्दों के आगे ये निस्तेज हो जाते हैं।

कवि विक्रम क्रांतिकारी(विक्रम चौरसिया -चिंतक /पत्रकार /आईएएस मेंटर /दिल्ली विश्वविद्यालय 9069821319मऊ
लेखक सामाजिक आंदोलनों से जुड़े रहे हैं व वंचित तबकों के लिए आवाज उठाते रहते हैं – स्वरचित मौलिक व अप्रकाशित लेख







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