खाने से पाखाने तक समाजवाद…


भाजपा के पास अनेक चीजें ऐसीं हैं जो प्रणम्य हैं.मसलन भाजपा के छोटे से लेकर बड़े कार्यकार्ता का आत्मविश्वास .इसी आत्मविश्वास के सहारे ही भाजपा संसद में दो के अंक से बढ़कर तीन सैकड़ा के ऊपर निकल सकी है. जम्मू-कश्मीर में जिला परिषद के चुनावों में गुपकार समूह के खिलाफ मैदान में उत्तरी भाजपा उतनी ही खुश है जितना कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय के शताब्दी समारोह में अपने समाजवादी दर्शन को लेकर खुश नजर आये .
मुझे समझ में आये या न ए लेकिन मै एक सच्चा भारतीय होने के नाते वक्त निकालकर माननीय प्रधानमंत्री जी का भाषण सुनता जरूर हूँ .माननीय का भाषण होता ही फकीराना है. अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय के भाषण में उन्होंने राजनीति से ऊपर उठकर काम करने का आव्हान किया और बताया कि भाजपा की सरकार ने कैसे राजनीति से ऊपर उठकर कोरोनाकाल में 80 करोड़ भारतीयों को मुफ्त भोजन कराया और कैसे देश में 10 करोड़ शौचालय बनवाये .,मेरे ख्याल से भाजपा का समाजवाद ही सच्चा समाजवाद है. लोहिया का समाजवाद तो किताबोब में पढ़ने के लायक ही है .
देश के नामचीन्ह विश्वविद्यालयों के प्रति भाजपा सरकार की धारणाएं कैसी रहीं हैं ये बताने की आवश्यकता नहीं है लेकिन प्रधानमंत्री जी ने अलीगढ़ वालों से महिला शिक्षा पार ध्यान देने के साथ ही यहां शोध पर भी ध्यान देने की बात कही. उन्होंने मजहब से बड़ा देश की आकांक्षाओं को बताया और भारत को आत्मनिर्भर भारत बनाने की बात कही .मुझे लगता है कि जैसा प्रधानमंत्री जी कहते हैं वैसा उनकी सरकार आचारण भी करने लगे तो सब कुछ सम्भव है ,लेकिन जब सरकार को एएमयू और जेएनयू जैसे शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चे देशद्रोही नजर आते हों तब ये सब बातें उचित नहीं लगतीं .
पिछले छह साल का इतिहास बताता है कि कैसे भाजपा और उसके अनुसांगिक संगठनों ने एएमयू और जेएनयू को अपना निशाना बनाया ,कैसे इन संस्थानों की अस्मिता को चोट पहुंचाई और कैसे इन संस्थानों को लांछित करने के बहाने खोजे ? यहां के छात्रों ने पिछले कुछ साल आतंक के साये में ही बिठाये हैं. केंद्र ने इन संस्थानों की स्वायतत्ता को कुचलने के लिए क्या नहीं किया. पुलिस की लाठियां जैसे इन्हीं शैक्षणिक संस्थानों के लिए बनीं हैं
प्रधानमंत्री जी ने देश में आईआईटी,आईआईएम और एम्स की सांख्या बढ़ने का दावा किया और सचमुच ये संस्थान बढ़े हैं लेकिन इनकी गुणवत्ता वैसी नहीं है जैसी पुराने संस्थानों की है .दुर्भाग्य ये है कि सियासत से ऊपर उठकर काम करने का आव्हान करने वाले लोग ही हर काम सियासत के नजरिये से करते आये हैं और करते जा रहे हैं , हर बात में सियासी नजरिये ने ही देश के वातावरण को बोझिल बना दिया है. जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने की बात हो या वहां जिला परिषद के चुनाव हों या बंगाल में बिधानसभा चुनावों के लिए जमीन बनाने की बात हो या हैदराबाद के स्थानीय निकाय के चुनाव हों,कहाँ सियासत से ऊपर उठकर काम किया गया ? यहां तक की बिहार विधानसभा के चुनाव में कोरोना की अजन्मी वैक्सीन तक को सियासत के लिए इस्तेमाल कर लिया गया .
रामचरित मानस में पांच सौ साल पहले गोस्वामी तुलसीदास ने एक महानायक के आचरण को इंगित करते हुए लिखा था कि -‘ पर उपदेश कुशल बहुतेरे । जे आचरहिं ते नर न घनेरे ‘.आज के माहानायक भी इसी उक्ति को सार्थक करते दिखाई देते हैं .यदि सरकार सियासत से ऊपर उठकर सारे काम कर रही होती तो आज देश के किसान 27 दिन से दिल्ली की देहलीज पर हाड़ कंपा देने वाली सर्दी में आंदोलन के लिए मजबूर नहीं होते ..मेरा अनुभव है कि जो सरकारें राजनीति से ऊपर उठकर काम करतीं हैं,उनका विरोध होता ही नहीं है. सरकार के फैसलों में यदि राजनीति होती है तो छिपाये नहीं छिपती ,लेकिन यदि फैसले लोकनीति और लोककल्याण की गरज से किये जाते हैं तो उन्हें जनसमर्थन भी मिलता है .
एएमयू से हटकर यदि आप जम्मू-कश्मीर की ही बात करें तो पाएंगे कि वहां से धारा 370 हटाने के पीछे जो राजनीतिक उद्देश्य था वो तो पूरा हो गया लेकिन जनाकांक्षाओं को आज तक पूरा नहीं किया गया. इस राज्य की विधानसभा को अब तक पुनर्जीवित नहीं किया गया ,यहां लोकतांत्र बहाली के लिए जिला परिषद के चुनाव कराये गए लेकिन इनमें भी मुंह की खाने के बाद सरकार के इरादे संदिग्ध दिखाई देते हैं .राज्य के कथित रूप से महाभ्रष्ट नेताओं के खिलाफ जिस तरह की कार्रवाइयां की जा रहीं हैं उनके पीछे की राजनीति भी सभी को नजर आ रही है .
अगर आप सचमुच राजनीति से ऊपर उठकर काम करना चाहते हैं तो आपको संसद और विधानसभाओं का गला नहीं घोंटना चाहिए, कोरोना एक बहाना है ,देश में एक संसद और कुछ विधानसभाओं का गला कोरोना के नाम पर ही घोंटा गया है ,अन्यथा देश में कोरोना के चलते सभी राजनीतिक गतिविधियां धड़ल्ले से चल रहीं हैं. कोरोनाकाल में ही बिहार विधानसभा के चुनावों के साथ ही 54 अन्य उप चुनाव भी सम्प्पन कराये गए .देश में खाने से पाखाने तक भी जो काम किया गया उसके पीछे सियासत ही थी ,यदि सियासत न होती तो कोरोनाकाल में पलायन न होता ,लोग सड़कों पर न मरते. .
बहरहाल देश में आने वाले दिनों में केंद्र या राज की सरकारें राजनीति से ऊपर उठकर लोककल्याण का काम करेंगीं इसमें संदेह ही संदेह है .सरकार किसी भी दल की हो उसके लिए राजनीति से ऊपर उठकर काम करना आसान नहीं होता ,और भाजपा के लिए तो बिलकुल ही नहीं होता .लेकिन उम्मीदों पर आसमान टिका है, यदि हमारे फकीर प्रधानमंत्री देश के विकास को राजनीति से ऊपर लेकर खड़ा कर दिखाएँ तो आनंद ही आनंद आ जाये .विसंगति ये है कि ये सियासत ही देश में कटुता का एकमात्र कारण है. इसी राजनीति ने देश को कमजोर कर रखा है. कालांतर में राजनीति देश की ताकत बने ,,,,,तो कुछ बात हो.
@ राकेश अचल

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