कौन चोर….. कौन साहूकार

डॉ टी महादेव राव
कितना अच्छा चोर था। हमारे संत महात्माओं ने कभी नहीं कहा था कि चोरों में भी अच्छे चोर होते हैं। चोरों में भी अच्छे चोर होते हैं और सज्जनों में चोरों की इस जहान में कमी नहीं है। लेकिन ऐसे अच्छे चोर को माखन जैसे मन वाले चोर को प्रत्यक्ष देख पाना भी कितना अद्भुत आश्चर्य होता? केवल कानों से सुनकर कृतार्थ हो सकने वाली चोर की कहानी कुछ इस तरह है – हरियाणा के जींद अस्पताल में चोर आया और जो थैला हाथ लगा लेकर फरार हो गया। बाद में उसे जब पता चला कि उस थैले में कोविड के टीके हैं तो उसे दुख हुआ – “अरे मैंने इस कोरोना काल में कितना बड़ा पाप कर दिया?” उस पुण्यात्मा चोर ने ग्लानि से भर कर तुरंत उस थैले को अस्पताल में रख दिया और एक चिट्ठी छोड़ी – “माफ करें! मुझे पता नहीं था कि इसमें कोविड की दवाइयां हैं। गलती से चुरा कर ले जा रहा था।” सूट बूट पहन कर कोरोना के नाम पर ही “व्यापार” करते बड़े लोगों की तुलना में यह चोर महापुरुष है या भोला मानुष।
कोविड के टीके हैं, जब उसे पता चला, तो किसी ओ एल एक्स में बेचने के बजाय वापस क्यों ले आया? कैसे जिएगा इस कलजुग में? कुछ दिन पहले महाराष्ट्र और गुजरात में क्या किया था कुछ लोगों ने? रेमडिसिविर दवाइयों को ओ एल एक्स में यह कहकर बेच दिया – “देर होगी तो निराशा होगी। कोविड को नियंत्रित करने वाली दवाई सही दामों में खरीद लें।” पूरे देश में रेमडेसीविर दवा की किल्लत क्यों न हो लेकिन काला बाजार में चालीस हज़ार रुपयों में आसानी से मिल रहा है न। सारा शहर जल रहा हो तो क्या उस आग में भुट्टे सेंक कर खाते हुये डकार लेने वाले ऐसे लोगों से कुछ अच्छे चोर को सबक लेनी चाहिए या नहीं?
ठीक है ओ एल एक्स में बिना पहचान बताए अनजान लोग गलत काम किए हैं, मान लेते हैं। लेकिन शानदार कपड़ों में, बिना एक भी बूंद पसीना बहाए, निजी अस्पतालों के जिम्मेदार लोग क्या कर रहे हैं यह कोरोना हमें आंखों देखा हाल बता रहा है। कोविड के लक्षण लिए अस्पताल पहुंचने भर की देर है, इलाज के नाम पर लाखों रुपये लूट रहे ऐसे लोगों के सामने छोटे-मोटे चोर उचक्के किस खेत की मूली हैं? इनके सामने तो चंदन चोर वीरप्पन भी कुछ नहीं। पैसा है, स्टेटस है इसलिए वह साहूकार है। चोर नहीं कह सकते हैं आप।
अस्पतालों के नाम पर याद आया “चोर चोर” की आवाज हैदराबाद के टिम्स (तेलंगाना इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस) के आसपास आ रही है। कोई अंतर्राज्यीय चोरों का दल नहीं आया। घर के चोर को डॉन की तरह पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। अस्पताल के कर्मचारियों में कुछ लोग अपनी चौर्य कला (चोरी करने की हाथ की सफाई) दिखा रहे हैं। कोविड से मृत लोगों के शव उनके रिश्तेदारों को सील करके सौंप जरूर रहे हैं, लेकिन उन पर के सोने चांदी के जेवरात पर अपनी हाथ की सफाई दिखा रहे हैं। ऐसे कई मामले सामने आए। “सारे लोग पी पी ई किट पहने हुए हैं, चोरों को कैसे पहचानें” कहकर अधिकारी वर्ग कन्नी काट रहा है जो मिला हुआ है उन नकाबधारी चोरों से। ठीक है अधिकारी वैसे ही कहेंगे, लेकिन सीसी कैमरे की पकड़ में आए बिना, चुटकी बजाते ही अपना काम कर लेने वाले इन चोरों की चोरी के कौशल के सामने बड़े-बड़े चोरों के गैंग भी फेल हैं, कम है।
सड़क पर कोविड की शंका मात्र से मरते आदमी को पानी तक न देने वाले लोगों को कोरोना के मृतकों के गहने भा रहे हैं, तो क्या कहा जाए? कहने के लिए क्या है? चोरों को किस तरह होना चाहिए यह इन्हें देखकर सीखना चाहिए उस भले मानुष चोर को।
भविष्यवाणी बताने वाले ने भी कभी नहीं सोचा होगा ऐसे दिन आएंगे जब हवा की भी चोरी होगी। हवा की चोरी पर आँख भौंह मत सिकोड़िए। यह न दिखने वाली हवा, वायु या अनल नहीं है। द्रवीकृत प्राणवायु (लिक्विफाइड ऑक्सिजन) को कुछ लोगों ने चुराया। हरियाणा के पानीपत से सिरसा जा रही ऑक्सिजन टैंकर को रास्ते में ही कुछ लोगों ने गायब कर दिया। अद्भुत! ऐसी है हमारी व्यवस्था, हमारा शासन और प्रशासन कहकर गरियाइए नहीं, क्योंकि ऐसा करते-करते हम थक गए हैं, ऊब गए हैं लेकिन कुछ भी नहीं हुआ। । प्राणवायु की कीमत दस गुना बढ़ गई है न इस समय। उससे बहुत पैसा बनाने के चक्कर में कुशाग्र बुद्धि वाले चोर ने ऐसा किया होगा। समय के अनुसार, हालातों के मुताबिक सोच बदल रही है। जिस चीज की बहुत अधिक मांग हो उसे ही चुराया जाए कह कर चोरी करने वाले राज्य का ही अच्छा चोर कोविड के टीके कैसे वापस कर गया? बुद्धू कहीं का!
ठीक है आज विश्व मलेरिया दिवस है। आजकल मच्छर यह कहते हुए आक्रमण कर रहे हैं कि कोरोना के आने के बाद कोई हमें पूछ ही नहीं रहा है, घास ही नहीं डाल रहा है। आने दो मच्छरों को। कोविड पीड़ितों, मृतकों के शमसानों के पास पैसों का हिसाब किताब कर अपने साथियों का खून चूसने वाले मनुष्यों द्वारा किए जा रहे रक्त चूषण के आगे इन मच्छरों की क्या बिसात? कितना खून चूसते हैं मच्छर? लेकिन उसे हम मारकर या दवाई से उसका खात्मा कर देते हैं। लेकिन कोरोनासुर से अधिक खतरनाक ऐसे रक्त पिपासु लोगों को हमें क्या करना चाहिए? उन्हें मालूम है कि कोई कुछ नहीं करेगा इसलिए उनका रक्त चूषण दिन-ब-दिन बढ़ रहा है। यहां कौन क्या कर रहा है? कुछ भी तो नहीं। कोविड के राक्षसी दांतों के बारे में जानते हुए भी शासन और प्रशासन क्या अपनी गहरी नींद से जागा है? नहीं न। कोडा हाथ में लेकर युद्ध स्तर पर काम कराने के बजाय शासक वर्ग क्या कर रहा है? अपने चुनावी दुंदुभी बजाने में बिजी है।
कामचोरों से लेकर तरह-तरह के प्राणदायक दवाओं के चोरों से जब समाज भर गया है तो कोरोनासुर का कराल नृत्य तो होता ही रहेगा। यही अपनी भाग्यरेखा है हमारे माथे पर लिखी वक्र रेखा है।

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