कैसी बदल गई है हवा कायनात की,
एक बात रह गई है इस जहान की।
हर तरफ मचा है कहर नाम जिसका कोरोना,
थोड़े ही दर्द में जान चले जाती बीमार की।
कंधा नसीब ना हो जिसे बाद मौत के,
रूहें तड़पती होगी ऐसे नौजवान की।
मरीजों के जो खुदा थे वो शैतान बन गए,
लंबी पड़ी है पर्चियां उनके गुनाह की।

हर शक्स घेरे में खड़ा, दिखता डरावना,
गर खा रहा हो गोलियां खासी जुकाम की।
होली दीवाली फीकी है बेरंग हाल है,
खाने में नहीं खुशबू अब आती मिठास की।
मिलने मिलाने का ये दौर हो रहा खतम,
हो नहीं रही शादियां रस्मो रिवाज की।
बेरोजगारी का असर ऐसे हुआ है,
रफ्तार हुई मंद भारत के विकास की।
मुश्किल के दौर में जो सभी साथ होते थे,
अब पूछने तबीयत नहीं जाते बीमार की।
मंदिरों में घंटियों का नाद अब नहीं रहा,
मस्जिदों से आती नहीं आवाजे अज़ान कि।
कीर्ति शर्मा (प्रित)






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