
जी हां! इस बुजुर्ग महिला का यह चित्र ही परिचय है। सुबह लगभग 6 बजे कोरबा के इतवारी बाजार में एक गंदे से नाले के पास बैठी हुई बर्तन धो रही थी… इसके लिए ना तो सुलभ शौचालय के दरवाजे खुले हैं न सरकार के प्रधानमंत्री आवास मैं जगह है। यह बाजार में ही रहती है और वही जीवन व्यतीत कर रही है इस महिला के लिए ना तो किसी शासकीय अस्पताल के दरवाजे खुले हैं न ही कोई योजना है और तो और सामाजिक संस्थाओं एनजीओ की नजर भी इस पर नहीं पड़ती। यह महिला संपूर्ण लोकतंत्र और व्यवस्था का नंगा सच है…!






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