
आज के समय में जब लगभग हर ऐतिहासिक व्यक्तित्व को विवादित बना दिया गया है, तब साल में दो बार, 23 मार्च और 28 सितम्बर ऐसे दिन होते है जब देश का हर तबका पूरे मन से एक व्यक्तित्व को याद करता है। पहली तारीख होती है उनका शहादत दिवस और दूसरी उनका जन्मदिवस। इस व्यक्तित्व का नाम है भगत सिंह- एक ऐसा नायक जिसका नाम सुनते ही देश के हर नागरिक के मन में सम्मान और भावनात्मक उबाल आ जाता है।
हसरत मोहानी के ‘‘इंकलाब जिन्दाबाद’’ के नारे को साकार करने वाले भगत सिंह केवल 23 साल और कुछ महीने तक जीवन जिया मगर इतनी अल्प आयु में उन्होंने जितनी वैचारिक परिपक्वता और लक्ष्य के प्रति जो दृढ़ता हासिल की वह विलक्षण थी। उनकी विलक्षणता इस बात से समझी जा सकती है-
फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और जब उनसे उनकी आखरी इच्छा पूछी गई तो उन्होंने कहा कि वह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और उन्हें वह पूरी करने का समय दिया जाए।
मनीष कुमार ( बिहार )







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