अंश की कलम से……मैं माँ भी हूँ और बेटी भी,किसी की बहन लगती तो किसी की पत्नी हूँ।अच्छा लगता है कि इन रिश्तों ने मेरे आस-पास सुरक्षा घेरा बनाया है पर उनके लिए क्या……???जिनकी मैं कुछ नही लगती….जिनके लिए मैं सिर्फ एक देह मात्र हूँ….. क्या सारे मानवीय रिश्तें घर तक ही सीमित रहना जरूरी है….क्यों घर से बाहर निकलते समय हम इन संवेदनाओं को घर पर ही छोड़ आते हैं….क्यों पत्थर को भगवान मानने वाले इस समाज को मैं समझ नही पा रही…क्यों आज भी स्त्री को देह मात्र ही समझा जाता है….. कई क्यों के जवाब नही मिलते…..जानती हूँ…. मुश्किल प्रश्न है,,,पर किसी को तो पहल करनी होगी….कुछ तो हल खोजना ही होगा…..मेरे अंदर की स्त्री छटपटा रही है….नही स्त्री सिर्फ देह नही….विचारों का ताप बढ़ता ही जा रहा है….काफी कोशिश करने पर भी नींद नही आ रही और कमरे की बत्ती जला देती।पति गहरी नींद में सो रहे हैं….उनका परिवार उनके मजबूत बाजूओं के घेरे में सुरक्षित है…वो खुश है….उन्हें सोनो दो…. फिर बच्चों के कमरें में जाती हूँ।माता पिता के साये में उन्हें क्या चिंता….कुछ देर उन्हें अपलक निहार बालकनी में खड़ी होती हूँ…. स्ट्रीट लाईट की रौशनी में कुछ आवारा कुत्ते हाथ-पैर सिकोड़े बैठे है….सब कुछ तो कितना शांत है….पर मन में विद्रोह है…पर किसके प्रति…..????आज तो अम्मा पर भी बहुत गुस्सा करने का मन करता है….क्यों नही जान पाई वो मेरे मन का विद्रोह…. कभी-कभी तो लगता है अंतर्मुखी होना एक बहुत बड़ा श्राप है….शायद यही कारण होगा कि विचार मुझे धीरे -धीरे जला रहा है….ब्लात्कार व शोषण स्त्री के हिस्से ही क्यों….क्यों अम्मा ने नही बताया कि जब कुछ गलत हो तो उसके खिलाफ आवाज उठाव…क्यों अम्मा हमारे व अपने अंदर की चेतना शक्ति को कमजोर समझकर चुप रहती व रहने की सलाह देती….ब्लात्कार सिर्फ शरीर का नही होता बल्कि कभी कभी शरीर को छुए बिना भी होता है…और इस तरह के ब्लात्कार का शिकार लगभग हर स्त्री कभी ना कभी जरूर होती….आज पता नही क्यों ना चाहते हुए भी कलम अपने आप चल रहा…..शायद इसे रोकने का सामर्थ मुझ में तो नही।एक बच्ची भीड़ में,बाज़ार में,मेला में और न जाने कहाँ कहाँ कितने ही अनजान हाथों की छूवन को चुपचाप बर्दास्त करते हुए निकलती है….उन छूवन को हम नही भूल पाते….ह्रदय पर एक घाव बन जाता है वह छूवन….उम्र के दूसरे पड़ाव पर स्कूल-कॉलेज जाते हुए,भद्दे कमेंट्स सुनने की आदि हो चुकी लड़कियों कभी कभार माँ से कह देती अपनी पीड़ा….सर पर हाथ फेरते माँ…. चुप रहने की सलाह देती….भाइयों को पता पड़ेगा तो लड़ाई झगड़ा होगा…हम भी चुप हो जाते….फिर सिंदूर व मंगलसूत्र के सुरक्षा घेरे में रख दिया जाता….पर दुख की बात है….इन्हें धारण करने के बाद भी हम सुरक्षित नही हैं….मैं अम्मा की तरह बिल्कुल नही हूँ…. मैंने लड़कियों को समझाया है….तुम स्वयं को पहचानना सीखों….अपने नाखूनों व दाँत जैसे अस्त्रों का इस्तेमाल करना….और ये बेटियां जब ऐसा करती है तो एक ऐसा विक्षिप्त वर्ग है जिससे यह बर्दाश्त नही होता और उन्होंने इन लड़कियों की रीढ़ की हड्डी तोड़कर,तरह-तरह के अमानवीय हरकत करके डरा रहे हैं….पर बेटियों, स्त्रियों तुम डरना नही….बस अपनी चेतना शक्ति को जाग्रत करो…. पार्वती के रूप में देवी को अपनी शक्ति ज्ञात ही ना था पर जब उनकी शक्ति जाग्रत हुई तभी महिषासुर नामक दैत्य मारा गया था….तो बढ़ने तो विचारो के ताप को….शायद यही सुप्त अवस्था में सो रही चेतना को जाग्रत कर दे……फिलहाल सुबह के तीन बजे है….और अब तक नींद नही है…
-प्रतिभा







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